इतनी भी नज़दीकियाँ ना बढ़ाओ | प्यार और रिश्तों पर हिंदी कविता
यह कविता “इतनी भी नज़दीकियाँ ना बढ़ाओ” उसी बारीक रेखा की बात करती है जहाँ प्यार दिखावे से नहीं, एहसास और सच्चाई से ज़िंदा रहता है।
प्यार और रिश्तों में सबसे ज़रूरी चीज़ संतुलन होती है। बहुत ज़्यादा नज़दीकियाँ कभी-कभी घुटन बन जाती हैं और बहुत ज़्यादा दूरियाँ रिश्तों को तोड़ देती हैं।
कभी-कभी चुप रहना भी प्यार होता है,
हर सवाल का जवाब शब्दों में नहीं,
दिल की गहराई में छुपा होता है।
यह कविता उन रिश्तों के लिए है
जो शोर से नहीं,
समझ और भरोसे से चलते हैं।
“नज़दीकियाँ और दूरियाँ”
इतनी भी नज़दीकियाँ ना बढ़ाओ,
कि दूरियाँ अच्छी लगने लगें,
प्यार की राहों में इतना मत खो जाओ,
कि नफरत ही अच्छी लगने लगें।
रिश्तों की गर्मी में थोड़ा ठहराव जरूरी है,
हर मुस्कान के पीछे कुछ भाव जरूरी है।
कभी-कभी चुप रहना भी प्यार होता है,
हर सवाल का जवाब नहीं, एहसास होता है।
दिल से दिल जुड़ते हैं तो लफ़्ज़ नहीं चाहिए,
सिर्फ सच्चाई चाहिए, दिखावे नहीं चाहिए।
प्यार निभाओ तो बस इतना निभाओ,
कि कल भी याद आए — “वो सच्चा था, वो अपना था।”
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