कलयुग में इंसान की संवेदनहीनता पर कविता।
समझने का समय कहाँ – आधुनिक समाज और संवेदनाओं की कमी पर आधारित हिंदी कविता।
आज का दौर तेज़ है —
इतना तेज़ कि लोगों के पास समझने का समय ही नहीं बचा।
हर व्यक्ति खुद को ज्ञानी समझता है, हर बात में तर्क ढूँढता है, पर किसी के दिल की आवाज़ सुनने की फुर्सत नहीं रखता।
यह कविता आधुनिक समाज की उसी विडंबना को उजागर करती है —
जहाँ लोग सुनने से ज़्यादा बोलना पसंद करते हैं। जहाँ समझने से ज़्यादा समझाना ज़रूरी हो गया है।
हम अक्सर दूसरों की समस्याओं का हल देने लगते हैं, बिना यह जाने कि सामने वाला सिर्फ़ सुना जाना चाहता है।
किसी के दर्द को महसूस करना, उसकी चुप्पी को समझना, उसकी आँखों की भाषा पढ़ना —
यही असली संवेदनशीलता है।
अगर हम कुछ पल रुक जाएँ, अपनी राय देने से पहले सामने वाले को सच में सुन लें —
तो शायद रिश्ते आसान हो जाएँ, और ज़िंदगी भी थोड़ी हल्की लगने लगे।
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💭 “समझने का समय कहाँ…” 💭
समझने का समय कहाँ,
इस कलयुग के दौर में।
हर कोई बना है ज्ञानी,
पर समझता नहीं शोर में।
लोग सुनते नहीं, बस बोलते हैं,
हर बात में तर्क ही खोलते हैं।
किसी के दर्द को महसूस नहीं करते,
बस समझाने में खुद को तोलते हैं।
कभी रुककर दिल से सुनो,
तो सुकून भी मिल जाएगा।
ज़िंदगी आसान हो जाएगी,
अगर कोई किसी को समझ जाएगा। 🌿
अंत में बात बहुत सरल है —
ज़िंदगी कठिन इसलिए नहीं है कि समस्याएँ ज़्यादा हैं,
बल्कि इसलिए है कि समझने वाले कम हैं।
अगर हर इंसान सिर्फ़ थोड़ा-सा समय
सुनने और समझने में लगाए,
तो रिश्तों में सुकून लौट आएगा।
कभी रुककर दिल से सुनिए —
शायद आपको भी एहसास होगा कि
समझना, समझाने से कहीं ज़्यादा सुंदर है। 💭🌿
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