मंदिर और भगवान (Mandir-Aur-Bhagwan)— आस्था बाहर नहीं, भीतर जागती है।
ईश्वर को लेकर अक्सर एक प्रश्न उठता है—क्या भगवान सच में मंदिर में रहते हैं या हमारे भीतर?
मंदिर और भगवान के बीच का संबंध केवल मूर्ति और इमारत तक सीमित नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और आत्मशुद्धि से जुड़ा होता है।
यह कविता हमें बताती है कि मंदिर बाहरी यात्रा नहीं, बल्कि भीतर झाँकने का माध्यम है।
🕉️ मंदिर और भगवान 🕉️
क्या भगवान सच में मंदिर में हैं?
या फिर वो हमारे मन के भीतर हैं?
मंदिर की घंटियों की गूँज,
मन को शांति देती है,
अगर दिल सच्चा हो तो,
हर जगह उनकी ही प्रतीति है।
लोग पूछते हैं— क्यों जाते हो मंदिर?
क्यों जलाते हो दीप, क्यों झुकाते हो सिर?
क्योंकि मंदिर सिर्फ पत्थर की इमारत नहीं,
यह विश्वास का दीपक है, यह आस्था की बुनियाद है।
यहाँ हम खुद को पाते हैं,
भीतर की शक्ति को जगाते हैं,
भक्ति की राह पर चलकर,
अहंकार को मिटाते हैं।
भगवान सिर्फ मूर्ति में नहीं,
हर प्राणी में बसते हैं।
मंदिर जाने का कारण यही है,
कि हम मन की गंदगी को धोते हैं।
असल में…
भगवान मंदिर में नहीं—
हमारे दिल की नीयत में हैं।
और मंदिर हमें यही याद दिलाने की जगह है। 🙏
मंदिर और भगवान (Mandir Aur Bhagwan) यह कविता हमें याद दिलाती है कि भगवान किसी एक स्थान में सीमित नहीं हैं। वे हमारे विचारों, व्यवहार और करुणा में बसते हैं।
मंदिर जाना हमें स्वयं से जोड़ता है, अहंकार को कम करता है और नीयत को शुद्ध करता है। जब मन पवित्र हो, तब हर स्थान मंदिर बन जाता है।
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