खिलौना तो आज भी बाज़ार में मिल जाता है, पर वो मासूम दिल दोबारा नहीं मिलता।
“खिलौना… जो कभी मेरी पूरी दुनिया था”
यह कविता सिर्फ़ एक खिलौने की कहानी नहीं है,
यह उस खोई हुई मासूमियत की कहानी है
जो उम्र बढ़ने के साथ
कहीं रास्ते में छूट जाती है।
बचपन में हम चीज़ों से नहीं,
भावनाओं से जुड़े होते हैं।
एक टूटा हुआ खिलौना भी
हमारे लिए अनमोल होता है।
लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं —
ख़्वाब बड़े हो जाते हैं,
ज़रूरतें बढ़ जाती हैं,
और दिल… थोड़ा-थोड़ा
खामोश होता चला जाता है।
🎠 खिलौना 🎠
कभी हँसी का कारण था,
कभी रोने का सहारा था।
वो छोटा-सा खिलौना मेरा,
दुनिया का सबसे प्यारा था।
मिट्टी में गिरे तो उठाया मैंने,
टूट गया तो भी सजाया मैंने।
उसमें नहीं था जान कोई,
फिर भी उसे अपनाया मैंने।
अब बड़े हो गए हैं ख़्वाब मेरे,
पर वो बचपन कहीं पीछे रह गया।
खिलौना तो अब भी बाजार में है,
पर वो मासूम दिल कहाँ रह गया? 💫
✨ कभी-कभी लगता है — ज़िंदगी भी एक खिलौना है,
जिससे खेलते हैं सब, पर समझता कोई नहीं।
“खिलौना” — एक कविता जो हमें हमारे बचपन की मासूमियत और भावनाओं की सच्चाई की याद दिलाती है।
यह कविता बताती है कि कैसे एक छोटा-सा खिलौना कभी हमारी पूरी दुनिया था, और आज जब हम बड़े हो गए हैं, तो वो सादगी और अपनापन कहीं खो गया है।
📖 कविता में झलकता है बचपन का प्यार, संवेदनाएँ और वो भूली-बिसरी यादें जो आज भी दिल को छू जाती हैं।
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