“जाने कहाँ चली गई हो… पर याद बहुत आती हो।”
इस कविता में प्रेम, दूरी, यादें और सुबह की पहली किरण की तरह लौटकर आने वाली भावनाओं को बेहद खूबसूरती से पिरोया गया है। यह कविता उन लोगों के दिल को ज़रूर छू जाएगी जो किसी अपने को याद करते हैं… जो दूर है, पर हर सुबह दिल के पास आ जाता है। अगर आप भी किसी को याद करते हैं, और हर सुबह उनकी याद धड़कनों पर दस्तक देती है—
तो ये कविता आपके दिल में उतर जाएगी।
🌅 जाने कहाँ चली गई हो…
जाने कहाँ चली गई हो,
पर याद बहुत आती हो…
सूर्य की उगती किरण के साथ
हर दिन तुम और भी ज़्यादा याद आती हो।
सुबह की ठंडी हवा
तुम्हारा नाम लेकर मेरे गालों को छू जाती है,
जैसे कह रही हो—
“उठो… मैं यहीं कहीं पास हूँ।”
ओस की बूंदों में
तुम्हारी मुस्कान झिलमिलाती है,
और हर किरण तुम्हारी
नरम सी यादों को मेरे दिल तक पहुँचाती है।
कभी-कभी लगता है
कि तुम उसी रोशनी में छिपी हो,
जो खिड़की से होकर
मेरे चेहरे पर गिरती है—
मानो तुमने ही उसे भेजा हो
मेरी ओर मुस्कुराने के लिए।
जाने कहाँ खो गई हो,
पर हर सुबह तुम लौट आती हो
मेरी यादों के आँगन में
एक नई किरण बनकर।
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